Biography of dignifying teachers in hindi

Biography of dignifying teachers in hindi

शिक्षको को राष्ट्र का निर्माता कहा गया है क्योंकि वे ही हमे इस योग्य बनाते है कि हम राष्ट्र निर्माण में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सके | दरअसल शिक्षक सिर्फ वे ही नही होते , जो हमे स्कूल या कॉलेज में पढाते है बल्कि जीवन के हर मोड़ पर कई बार हमे साथी सहकर्मी के रूप में ऐसे शिक्षक मिल जाते है जो हमे योग्य बनने में अपनी अहम भूमिका निभाते है | हमारे देश में हर क्षेत्र में ऐसे कई महान शिक्षक हुए | जिनकी वजह से आज का आधुनिक और प्रगतिशील भारत हम सब के सामने है | शिक्षक दिवस पर इन शिक्षको के बारे में जानकार आपको भी गर्व होगा.

अन्तरिक्ष कार्यक्रम के जनक थे विक्रम साराभाई

विक्रम साराभाई भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम के जनक होने के साथ साथ एक बेहतरीन शिक्षक थे | डा. विक्रम अम्बालाल साराभाई साथ काम करने वाले रिसर्च एसोसिएट बाद में बड़े वैज्ञानिक बने | इन्होने ही भारत को अन्तरिक्ष अनुसन्धान के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय मानचित्र पर पहुचाया | साराभाई शिक्षाविद और कला के पारखी थे | डा.साराभाई ने अलग अलग क्षेत्रो में अनेक शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की या स्थापना में मदद की | वे परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष भी रहे | IIT अहमदाबाद की स्थापना में भी साराभाई ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई | इन्होने ही भारतीय उपग्रहों के निर्माण के लिए परियोजना की शुरुवात की | इसके परिणामस्वरूप प्रथम भारतीय उपग्रह , आर्य भट्ट , रूसी कोस्मोड्रोम से 1975 में कक्षा में स्थापित किया गया |

प्रोफेसर सतीश धवन ने दी इसरो को नई दिशा

सतीश धवन भारत के प्रसिद्ध राकेट वैज्ञानिक थे | देश के अन्तरिक्ष कार्यक्रम को नई ऊँचाइयो पर पहुचाने में इनका महत्वपूर्ण योगदान था | एक महान वैज्ञानिक होने के साथ साथ प्रोफेसर सतीश धवन एक कुशल शिक्षक भे थे | इन्हें भारतीय प्रतिभाओं पर बहुत भरोसा था | सतीश धवन को ही डा.विक्रम साराभाई के बाद देश के अन्तरिक्ष कार्यक्रम की जिम्मेवारी सौंपी गयी थी | बाद में ISRO के अध्यक्ष भी नियुक्त किये गये | प्रोफेसर धवन ने IIT में कई सकारात्मक बदलाव किये | इन्होने संस्थान में देश के अलावा विदेशो से भी युवा प्रतिभाओं को शामिल किया | इन्होने कई नये विभाग भी शुरू किये और छात्रों को विविध क्षेत्रो में शोध के लिए प्रेरित किया

मिसाइल मैंन और बेमिसाल शिक्षक

किसी राष्ट्र के विकास में शिक्षक की क्या भूमिका होती है | इसकी सीख भारत के पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे.अब्दुल कलाम के जीवन से मिलती है | देश के सर्वोच्च सम्मान राष्ट्रपति पद पर पहुचने के बाद भी शिक्षक बने रहना , राष्ट्रपति पद से निवृति के दुसरे दिन से ही शिक्षक के कार्य को अपनाना तथा पूर्व राष्ट्रपति के स्थान पर कार्यरत प्रोफेसर कहलाना , उनकी शिक्षक के प्रति सम्मान को दर्शाता है

आजीवन शिक्षक बनी रही असीमा चटर्जी

प्रोफेसर असीमा चटर्जी का आर्गेनिक केमिस्ट्री के क्षेत्र में योगदान अतुलनीय रहा है | प्रोफेसर चटर्जी ने सुयोग्य छात्रा से लेकर सफल शिक्षक एवं वैज्ञानिक की जीवन यात्रा पुरी की | वे देश की प्रथम महिला बनी जिन्होंने रसायन विज्ञान में शान्ति स्वरूप भटनागर पुरुस्कार प्राप्त किया | देश की प्रथम महिला वैज्ञानिक हुयी , जिन्हें पद्मभूषण सम्मान से सम्मानित किया गया | प्रोफेसर चटर्जी भारतीय विज्ञान कांग्रेस की प्रथम महिला जनरल प्रेसिडेंट चुनी गयी | कई विश्वविद्यालयो में उन्हें DSC की मानद उपाधि प्रदान की | 1982 से 90 तक राज्यसभा की सदस्य भी मनोनीत की गयी | इन सभी चीजो के अलावा वे आजीवन शिक्षक के रूप में भी अपनी सेवाए देती रही | कैंसर के इलाज में इनका शोध मील का पत्थर साबित हुआ |

बिना वेतन तीन साल पढाते रहे बोस

जगदीश चन्द्र बोस की जीव विज्ञान में बहुत रूचि थी फिर भी भौतिकी के एक विख्यात प्रो.फादर लाफोंट ने बोस को भौतिकी के अध्ययन के लिए प्रेरित किया | भौतिकशास्त्र में स्नातक की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 22 वर्षीय बोस चिकित्सा विज्ञान की पढाई करने के लिए लन्दन चले गये | वर्ष 1885 में वे स्वदेश लौटे तथा भौतिकी के सहायक प्राध्यापक के रूप में प्रेसीडेंसी कॉलेज कोलकाता में पढाने लगे | यहा वह 1915 तक पढाते रहे | उस समय भारतीय शिक्षको को अंग्रेज शिक्षको की तुलना में एक तिहाई वेतन दिया जाता था | इसका जगदीश चन्द्र ने विरोध किया और बिना वेतन के तीन वर्षो तक अध्यापन करते रहे | आखिरकार चौथे वर्ष बोस की जीत हुयी और उन्हें पूरा वेतन दिया गया |